ये हैं सबसे डैशिंग बाहुबली: घर में लगाता था COURT, बंदूक की नाल पर सुनाता था फैसला

बिहार लंबे समय तक जातिवाद और आतंक के बंधनों में घिरा रहा। यहां चुनाव वोटों पर नहीं जातीय आधार और दबंगई पर जीते जाते थे। जिसका जुर्म की दुनिया में जितना बढ़ा नाम और कद उसके जीतने की उतनी गारंटी। हम आपकों ऐसे ही एक शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके नाम की दहशत आज भी बिहार के बच्चे-बच्चे के अंदर है। वो नाम है मोहम्मद शहाबुद्दीन उर्फ साहब। शहाबुद्दीन के बारे में कहा जाता है कि वह एक समानांतर सरकार चलाते थे। उनके घर पर कोर्ट सजती थी, फैसले सुनाए जाते थे। मोहम्मद शहाबुद्दीन को आरजेडी चीफ और बिहार के पूर्व मुख्यंमत्री लालू प्रसाद यादव का बेहद करीबी माना जाता है। शहाबुद्दीन की दबंगई की कहानी कॉलेज के दिनों से शुरु हुई जो आतंक के शक्ल में जारी रही है। आज जितनी उनकी उम्र है, उससे ज्यादा उन पर मुकदमें हैं।
शहाबुद्दीन का जन्म बिहार के सीवान जिले के प्रतापपुर में 10 मई 1967 को हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पहले प्रतापपुर से फिर सीवान से हुई। सीवान के डीएवी कॉलेज पढ़ने के बाद राजनीति में एमए की उपाधि हासिल की। इसके बाद उन्होंने 2000 में मुजफ्फरपुर के बीआर अंबेडकर बिहार से पीएचडी की उपाधि हासिल की, जो काफी विवादों में रही। उनकी शादी हिना शेख से हुई, जो 2009 में सीवान लोकसभा सीट से राजद के तरफ से चुनाव लड़ी थीं और हार गई थीं। उनके एक पुत्र और दो पुत्रियां हैं।
महज 21 साल की उम्र में शहाबुद्दीन के खिलाफ सीवान के एक थाने में पहला मामला दर्ज हुआ था। धीरे-धीरे शहाबुद्दीन सीवान के मोस्ट वांटेड क्रिमिनल बन गए। शहाबुद्दीन पर उनकी उम्र से भी ज्यादा 56 मुकदमे दर्ज हैं। इनमें से 6 में उन्हें सजा हो चुकी है। भाकपा माले के कार्यकर्ता छोटेलाल गुप्ता के अपहरण व हत्या के मामले में वह आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे हैं।

Mohammad Shahabuddin

2003 में शहाबुद्दीन को वर्ष 1999 में माकपा माले के सदस्‍य का अपहरण करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिए गया, लेकिन वे सेहत खराब होने का बहाना कर सीवान जिला हॉस्पिटल में रहने लगे, जहां से वे 2004 में होने वाले चुनाव की तैयारियां करने लगे। चुनाव में उन्होंने जनता दल यूनाइटेड के प्रत्याशी को 3 लाख से अधिक वोटों से हराया। इसके बाद शहाबुद्दीन के समर्थकों ने 8 जदयू कार्यकर्ताओं को मार डाला तथा कई कार्यकर्ताओं को पीटा। समर्थकों ने ओमप्रकाश यादव के ऊपर भी हमला कर दिया जिसमें वे बाल-बाल बचे, मगर उनके बहुत सारे समर्थक मारे गए। इस घटना के बाद मो. शहाबुद्दीन के ऊपर बिहार के कई थानों में 34 मामले दर्ज हो गए।

1986 में हुई थी पहली एफआईआर

शहाबुद्दीन का सियासी सफर शुरू होने से काफी पहले उनकी दबंगई के चर्चे आम थे। रिकॉर्ड के मुताबिक उन पर पहली एफआईआर 1986 में सीवान जिले के हुसैनगंज थाने में दर्ज हुई थी। उसके बाद उनकी छवि ऐसी बनी कि लोग सरेआम उनका नाम लेने से भी डरते थे। चुनाव लडऩे के दौरान सीवान शहर में शहाबुद्दीन की पार्टी को छोड़कर दूसरे किसी प्रत्याशी का झंडा लगाने की हिम्मत किसी को नहीं होती थी।

Mohammad Shahabuddin

1990 में पहली बार बने विधायक

सीवान जिले के जिरादेई विधानसभा से वह पहली बार जनता दल के टिकट पर विधानसभा पहुंचे। तब वह सबसे कम उम्र के जनप्रतिनिधि थे। दोबारा उसी सीट से 1995 में चुनाव में जीत दर्ज की। 1996 में वह पहली बार सीवान से लोकसभा के लिए चुने गए। एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें गृह राज्य मंत्री बनाए जाने की बात चर्चा में ही आई थी कि मीडिया में शहाबुद्दीन के आपराधिक रिकॉर्ड की खबरें छपीं। इसके बाद उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने का मामला पीछे रह गया।

जिसकी सरेआम पिटाई की, उसी ने 2 बार हराया

अपहरण और हत्या के मामले में शहाबुद्दीन को 2007 में आजीवन कारावास की सजा हुई थी। आपराधिक मामले में सजा मिलने के बाद चुनाव आयोग ने उनके चुनाव लडऩे पर प्रतिबंध लगा दिया। इस तरह 2009 के लोकसभा चुनाव में वह चुनाव नहीं लड़ सके। ऐसे में राजद ने 2009 और 2014 में शहाबुद्दीन की पत्नी हीना शहाब को टिकट दिया था, पर निर्दलीय ओम प्रकाश यादव ने 2009 में उन्हें करीब 60 हजार वोटों से हरा दिया था। इसके बाद 2014 में बीजेपी के टिकट पर ओम प्रकाश ने 1 लाख से भी वोटों से हीना को हरा दिया। यह वही ओम प्रकाश थे जिन्हें कभी शहाबुद्दीन ने सरेआम पीटा था।

पुलिस अफसर को मारा, विवाद में कई पुलिस वालों की गई जान

16 मार्च 2001 सीवान पुलिस के लिए काला दिन था, मो. शहाबुद्दीन ने राजद नेता मनोज कुमार की गिरफ्तारी के दौरान गई पुलिस को रोका और पुलिस अफसर को जोरदार चां’टा तथा उनके समर्थकों ने पुलिस को मारा था। इस घटना ने बिहार पुलिस को झकझोरकर रख दिया। बिहार पुलिस ने तुरंत टास्‍क फोर्स तथा UP पुलिस के साथ मिलकर मो. शहाबुद्दीन के गांव तथा घर को घेरकर हमला कर लिया। इस हमले के बाद दोनों ओर से कई राउंड गोलियां चलीं जिसमें पुलिस वाले सहित कई लोग मारे गए। इस मुठभेड़ के बाद भी मो. शहाबुद्दीन घर से भागकर नेपाल पहुंच गया।

आईएसआई से थे संबंध, घर में मिले थे पाक मेड हथियार

राज्य के तत्कालीन डीजीपी डीपी ओझा ने शहाबुद्दीन के आईएसआई से लिंक के बारे में सौ पेज की रिपोर्ट दी थी। तब वह रिपोर्ट देश भर में चर्चा में थी। दरअसल, अप्रैल 2005 में सीवान के तत्कालीन एसपी रत्न संजय और डीएम सीके अनिल ने शहाबुद्दीन के प्रतापपुर स्थित घर पर छापेमारी की थी। उस दौरान पाकिस्तान निर्मित कई गोलियां, एके 47 सहित ऐसे उपकरण मिले थे जिसका इस्तेमाल सिर्फ मिलिट्री में ही किया जाता है। उसमें नाइट ग्लास गॉगल्स और लेजर गाइडेड भी शामिल था। इन उपकरणों पर पाकिस्तान आडिनेंस फैक्टरी के मुहर लगे हुए थे। इस घटना के बाद जिले में तनाव बढ़ गया जिससे संभालने के लिए जिले में कई महीनों तक टास्‍क फोर्स मौजूद रही।

जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष की हत्या का लगा था आरोप

मार्च 1997 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर को सीवान में तब गोलियों से छलनी कर दिया गया था, जब वो एक कार्यक्रम के सिलसिले में नुक्कड़ सभा कर रहे थे। इस हमले में शहाबुद्दीन के बेहद करीबी रहे रुस्तम मियां को सजा हो चुकी है। यह अजीब है कि अपराध की दुनिया में खासा दखल रखने वाले शहाबुद्दीन ने मुजफ्फरपुर के बीआर अम्बेडकर विश्वविद्यालय से पोलिटिकल साइंस में पीएचडी की डिग्री हासिल की।

लगता था कोर्ट, सुनाया जाता था फैसला

सामाज पर शहाबुद्दीन का प्रभाव तो पहले से ही पडऩा शुरू हो गया था। जैसे-जैसे सत्ता का संरक्षण मिलता गया, उनकी ताकत भी बढ़ती गयी। शहाबुद्दीन की अदालत काफी सुर्खियों में रही थी। फरियादी उनके पास आते और वहां से तत्काल न्याय पाते। इस क्रम में उन्होंने फरमान जारी किया कि डॉक्टरों की फीस 50 रुपए होगी। जाहिर है किसी में इस आदेश को नकारने की हिम्मत नहीं थी। हालांकि, अब डॉक्टरों ने अपनी फीस बढ़ा दी है।

(नोट यह पूरी पोस्ट पत्रिका डॉट कॉम से साभार ली गई है।)

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