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2024 में ममता के दिल्ली कूच का ऐलान, मोदी-शाह को ऐसे मिलेगी बड़ी चुनौती

बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की पूरी जोर आजमाइश के बावजूद बड़े बहुमत से जीतने वाली ममता बनर्जी की नजर अब केंद्र की कुर्सी पर है। ममता बनर्जी ने सोमवार को 2024 लोकसभा चुनाव के लिए तृणमूल का कांग्रेस का नारा जारी किया है- देश जादेर चाइछे यानी जिसे देश चाहता है। पूरा कोलकाता ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की फोटो लगे पोस्टरों से पट गया है। जिनसे साफ जाहिर है कि ममता बनर्जी ने 2024 के चुनाव के लिए क्या लक्ष्य रखा है।

21 को वर्चुअल रैली करेंगी, यूपी और दिल्ली में स्ट्रीमिंग होगी

चुनावी कैंपेन की नई टैग लाइन तब जारी की गई है, जब 21 जुलाई को ममता पार्टी के शहीद दिवस का बड़ा प्रोग्राम करने जा रही है। 1993 में 21 जुलाई को पुलिस फायरिंग में 13 यूथ वर्कर्स की जान गई थी। 21 जुलाई को ममता बनर्जी एक वर्चुअल रैली करेंगी। इसकी स्ट्रीमिंग दिल्ली, उत्तर प्रदेश, असम, त्रिपुरा और दूसरी जगहों पर भी की जाएगी। पिछले साल इस दिन ममता ने अपने दफ्तर से पार्टी वर्कर्स को संबोधित किया था।

मोदी-शाह को रोकने वाली देश की अकेली लीडर ममता: तृणमूल

तृणमूल के राज्यसभा सदस्य ने टेलीग्राफ से कहा कि ममता नेशनल पॉलिटिक्स को लेकर अपनी योजना और नजरिया 48 घंटे के भीतर सबके सामने रखेंगी। 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद ये साफ हो गया है कि देश में ममता ही अकेली नेता हैं, जो नरेंद्र मोदी और अमित शाह को रोक सकती हैं। तृणमूल के एक सूत्र ने कहा कि दीदी की राजनीतिक योजना के बहुत फायदे हैं। गुजरात जैसे राज्यों में विपक्ष की जगह खाली है और दीदी उसे हासिल करना चाहती हैं।

बंगाल विधानसभा जैसा नारा

ममता का ‘जिसे देश चाहता है’ नारा उस नारे से मिलता जुलता है, जो उन्होंने इसी साल हुए बंगाल विधानसभा चुनाव में दिया था। बंगाल में ममता ने नारा दिया था- बांग्ला नीजेर मेये के चाए यानी बंगाल अपनी बेटी चाहता है। बेटी की इमेज बहुत सोच-समझकर पेश की गई थी ताकि बंगाली जनता को ममता पड़ोस की वो लड़की दिखाई दे, जिसने अकेले ही वाम किले को ढहा दिया था। तृणमूल का महासचिव बनाए जाने के तुरंत बाद अभिषेक बनर्जी ने कहा था कि अब पार्टी केवल बंगाल नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों में भी चुनाव लड़ेगी। इससे पहले भी तृणमूल केरल और गुजरात में चुनाव लड़ चुकी है, पर ज्यादा असर नहीं डाल पाई। नॉर्थ ईस्ट में मणिपुर, अरुणाचल और त्रिपुरा में पार्टी ने पकड़ बनाई पर उसे कायम नहीं रख सकी। तृणमूल के एक नेता ने कहा कि अब देश का मूड अलग है।

ममता का केंद्र का सपना नया नहीं

ममता बनर्जी के मन में दिल्ली दरबार का सपना नया नहीं है। 2012 में जब उन्होंने राष्ट्रपति के लिए UPA की ओर से प्रणब मुखर्जी के नॉमिनेशन का विरोध किया था और एपीजे अब्दुल कलाम का नाम रखा था, तभी ये जाहिर हो गया था कि उनके मन में केंद्र की राजनीति है। 2014 में ममता की पार्टी ने 40 लोकसभा सीटें जीती थीं, इसके बावजूद उन्हें केंद्र में कोई रोल नहीं मिला, क्योंकि मोदी की अगुआई में भाजपा को सबसे बड़ा बहुमत हासिल हुआ था। 2019 में भी हालात यही रहे। हालांकि, ममता भी 2021 के चुनावों में पहले से ज्यादा बहुमत के साथ लौटी हैं। 2019 में ममता बनर्जी करीब-करीब सभी विपक्षी दलों को एक मंच पर ले आई थीं, जब उन्होंने कोलकाता के ब्रिज परेड ग्राउंड में रैली की थी। हालांकि, NDA और UPA, दोनों सरकारों का हिस्सा रह चुकी तृणमूल को विश्वसनीय साथी न तो कांग्रेस मानती है और न ही भाजपा। विपक्ष के लिए 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लिटमस टेस्ट की तरह होंगे और ये तृणमूल के लिए भी बहुत बड़ा मौका साबित हो सकते हैं। बंगाल जीत के बाद तृणमूल ने उत्तर प्रदेश में मेंबरशिप कैंपेन शुरू किया है। तृणमूल की नजर ग्रामीण इलाकों के असंतुष्ट चल रहे बसपा के नेताओं पर है।

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