CM कमलनाथ और पूर्व CM शिवराज के बीच हो रहा हैं MP की इस विधानसभा सीट का उपचुनाव, जानिए झाबुआ विधानसभा उपचुनाव की इन साइड स्टोरी, जो हिला सकती हैं मुख्यमंत्री कमलनाथ की कुर्सी

मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिला झाबुआ इन दिनों मध्यप्रदेश की राजनीति का केंद्र बिन्दु बना हुआ हैं और होगा भी क्यों नही क्योंकि झाबुआ विधानसभा उपचुनाव जो हैं। यहाँ 15 वर्षो के वनवास के बाद प्रदेश की सत्ता में आई कांग्रेस और अपना जनाधार गवाकर विपक्ष में बैठी भाजपा के बीच सीधा मुकाबला माना जा रहा हैं। कांग्रेस और भाजपा के दिग्गज नेता इस सीट को जितने के पुरजोर कोशिश में लगे हैं। हर रोज दोनों ही पार्टी के छोटे-बड़े नेता इस विधानसभा सीट पर प्रचार करते हुए नजर आ रहें हैं। यहाँ 21 अक्टूबर को मतदान होगा और 24 को परिणाम आएगा जो मध्य प्रदेश की राजनीति के लिए आगामी वर्षो के लिए काफी कुछ तय करेगा। झाबुआ विधानसभा चुनाव बीजेपी-कांग्रेस के बजाय मुख्यमंत्री कमलनाथ विरुद्ध पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बीच नजर आ रहा हैं। हम आपको झाबुआ विधानसभा उपचुनाव की इनसाइड स्टोरी बताने जा रहें हैं। इससे पहले हम आपकी जानकारी के लिए बता दे की यहाँ पर आखिर उपचुनाव क्यों हो रहें हैं। दरअसल 2018 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी बाहुल्य झाबुआ और आलीराजपुर जिले की झाबुआ विधानसभा सीट को छोड़कर बाकि सभी सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। 2018 के चुनाव में अफसरशाही से रिटायर्ड होकर आये गुमानसिंह डामर को भाजपा ने इस सीट पर अपना उम्मदीवार बनाया था और गुमानसिंह डामोर ने उपचुनाव के उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया के बेटे डॉ. विक्रांत भूरिया को अच्छे वोटो से हराया था। जिसके बाद लोकसभा चुनाव में यहाँ पर कांग्रेस ने जैसे ही पूर्व केंद्रीय मंत्री और उपचुनाव के उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया के नाम की घोषणा की वैसे ही भाजपा ने एक बार फिर गुमानसिंह डामोर पर अपना दाव खेला। बेटे को हराने वाले गुमानसिंह डामोर ने रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट से कांतिलाल भूरिया को ऐतिहास वोटो से हरा दिया। अब गुमानसिंह डामोर को या तो सांसद रहना था या फिर विधायक। भाजपा संगठन के कहने पर गुमानसिंह डामोर ने विधायकी से इस्तीफा दे दिया। इसलिए अब झाबुआ विधानसभा का उपचुनाव हो रहा हैं।

एक तरफ सत्ता का मोह तो दूसरी तरफ युवा जोश के साथ अंतर्कलह

झाबुआ विधानसभा उपचुनाव में कुल 5 प्रत्याशी मैदान में हैं। कांग्रेस ने यहाँ पर 2019 का लोकसभा चुनाव हार चुके पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं MPCC अध्यक्ष रह चुके कांतिलाल भूरिया को टिकट दिया हैं तो वही दूसरी और भाजपा ने दो बार से भाजयुमो के जिला अध्यक्ष भानु भूरिया को टिकट दिया हैं। वही बीजेपी से टिकट ना मिलने पर बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता कल्याणसिंह डामोर भाजपा के लिए सर दर्द का कारण बने बैठे हैं। वही 2 अन्य प्रत्याशी भी मैदान में हैं।  कांग्रेस में खुलकर कोई विरोध नही हैं लेकिन यहाँ दबी जुबान में यह जरूर सुनाई दे रहा हैं कि आखिर कांतिलाल भूरिया ही क्यों..? 2018 के चुनाव में कांतिलाल के बेटे चुनाव हारे तो 2019 के लोकसभा में वे खुद चुनाव हार गए। फिर भी उपचुनाव में कांतिलाल को ही टिकट क्यों दिया गया। इधर भाजपा में भानु भूरिया को टिकट दिए जाने के बाद से ही अंतर्कलह देखने को मिल रहा हैं। ऐसे में झाबुआ विधानसभा का उपचुनाव रौचक बन बैठा हैं।

इसलिए कमलनाथ बनाम शिवराज मुकाबला 

झाबुआ विधानसभा उपचुनाव मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बीच देखा जा रहा हैं। इस उपचुनाव पर दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई हैं। एक और पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान हैं जो 15 वर्ष से सत्ता पर काबिज रही भाजपा में लगभग 13 वर्ष मुख्यमंत्री रहें हैं। वही दूसरी और वर्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ हैं जो लगभग 11 माह से प्रदेश की सत्ता में काबिज हैं। अगर यहाँ भाजपा चुनाव जीतती हैं तो यह तय हो जाएगा कि आज भी शिवराज के चाहने वालो की कमी नही है और वर्तमान कांग्रेस सरकार से जनता ना खुश हैं। लेकिन अगर यहाँ कांग्रेस चुनाव जीती तो कमलनाथ का सीएम बने रहा आगामी वर्षो तक तय रहेगा। साथ ही कमलनाथ यहाँ की जीत को प्रदेश में कांग्रेस सरकार के प्रति जनता के भरोसें कायम रखने का पैगाम देते नजर आएंगे।

बीजेपी-कांग्रेस का माईनस प्वाइंट 

झाबुआ विधानसभा उपचुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही कुछ ऐसे माईनस प्वाइं हैं जो उन्हें यहाँ से जीत हासिल करने में चुनोती दे सकते हैं। सत्ता में आई कांग्रेस के लिए गुटबाजी अभी भी खत्म नही हुई हैं। प्रदेश में एक गुट कमलनाथ-दिग्विजय का तो दूसरा गुट ज्योतिरादित्य सिंधिया का हैं। यह गुटबाजी झाबुआ उपचुनाव में भी देखने को मिल रही हैं। झाबुआ उपचुनाव के लिए कांग्रेस ने जिन नेताओ को स्टार प्रचारक बनाया हैं वे सभी दिग्विजय गुट के हैं। सिंधिया गुट के एक भी नेता और मंत्री को यहाँ पर कांग्रेस ने स्टार प्रचारक नही बनाया हैं। जो कांग्रेस के लिए दिक्कत बन सकता हैं तथा कमलनाथ सरकार के चुनाव से पूर्व किए गए कुछ ऐसे वादे जो आज तक पूरे नही हुए हैं वे भी दिक्कत दे सकते हैं। अगर बात करे भाजपा की तो भाजपा को यहाँ अंतर्कलह का खतरा हैं। भाजपा से बगावत कर चुनाव लड़ रहें कल्याणसिंह डामोर सहित टिकट ना मिलने से नाखुश नेता बीजेपी के वोट काट सकते हैं।

कांग्रेस को इसलिए जितना जरूरी –

झाबुआ विधानसभा उपचुनाव कांग्रेस को जितना इसलिए जरूरी हैं क्योंकि यहाँ की जीत यह तय करेगी की जनता कांग्रेस सरकार से खुश हैं या नही और अगर हार जाती हैं तो भाजपा विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाकर कमलनाथ की कुर्सी हिला सकती हैं। इसलिए कांग्रेस इस सीट को जितने में कोई भी कसर नही छोड़ेगी। साथ ही कांग्रेस उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हैं। भूरिया कांग्रेस के दिग्गज नेता हैं और आदिवासियों में अपनी अच्छी पकड़ रखते हैं अगर वे हारे तो उन्हें लम्बा वनवास भुगतना पड़ सकता हैं।

भाजपा को इसलिए जितना जरूरी –

मध्य प्रदेश में कुल 230 विधानसभा सीट के लिए चुनाव हुआ था। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 114, भाजपा को 109 और 7 सीट अन्य के खाते में गई थी। सपा-बसपा और अन्य निर्दलीय विधायको को मिलाकर कांग्रेस ने प्रदेश में सरकार बना ली। उपचुनाव से पहले भाजपा के पास 108 सीट बची हैं अगर भाजपा यहाँ से वापस चुनाव जीत जाती है तो पुनः 109 सीट भाजपा के पास रहेगी और इसी के दम पर बीजेपी जोड़तोड़ वाली रणनीति बनाकर 116 विधायको के साथ इस दम पर अपनी सरकार बना सकती है कि कांग्रेस सरकार से जनता ना खुश हैं। लेकिन कांग्रेस चुनाव जीतती हैं तो उसके पास 115 विधायक हो जाएंगे। यानि की कांग्रेस को सत्ता हाथ से जाने का कोई खतरा नही रहेगा उसे बस सरकार में बने रहने लिए केवल 1 ही विधायक को अपने पाले में करना पड़ेगा। अब देखना दिलचस्प होगा की झाबुआ विधानसभा की जनता 15 साल सत्ता में रही बीजेपी को वोट देती है या 11 माह से सत्ता पर काबिज कांग्रेस को.. क्योकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद यह पहला उपचुनाव हैं। जिसका परिणाम ना सिर्फ झाबुआ तक सीमित रहेगा बल्कि यह कमलनाथ की कुर्सी तक हिला सकता हैं।

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