Home Political Samachar मध्यप्रदेश के इस चुनावी युद्ध में शिवराज ही जीतेंगे, शिवराज ही हारेंगे?

मध्यप्रदेश के इस चुनावी युद्ध में शिवराज ही जीतेंगे, शिवराज ही हारेंगे?

बब्बन कुमार सिंह @ अगर आप मध्य प्रदेश में निवास करते हैं और सूचनाओं के लिए केवल मुख्य धारा की मीडिया पर निर्भर हैं तो कई बार लगेगा कि तमाम झंझावातों के बावजूद इस बार का विधानसभा चुनाव भी भाजपा ही जीत रही है. इसके पीछे दिए जाने वाले तर्कों में एक नजर में बहुत दम भी नजर आता है. मसलन, बहुकोणीय चुनावों में सत्ता में रही पार्टियों के जीतने का इतिहास रहा है. सत्ता विरोधी लहर होने के बावजूद भी पिछला चुनाव भी गुटों में बंटी होने के कारण मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस हार गई थी. इसी तरह तमाम विरोधी दावों को धता बता कर भाजपा ने 2008 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को हराया. आदि-आदि. लेकिन इस बात की सच्चाई जानने के लिए हमें कुछ अन्य तथ्यों पर भी सोच-विचार करना चाहिए. कॉर्पोरेट दुनिया के पदचिन्हों पर तेजी से अग्रसर भाजपा के पास आज मोदी और अमित शाह जैसे भारत के सफल ब्रांड नेतृत्व है जो भाजपा व संघ के विशाल संगठन नेटवर्क व हालिया कई चुनावों में जीत हासिल कर गर्व से फूले नहीं समा रहा है. ऐसे में भाजपा समर्थकों के इस सोच में कोई दोष नहीं झलकता कि मध्य प्रदेश जैसे संघ की प्रायोगिक भूमि पर तमाम कमियों के बावजूद वे हारती बाजी भी पलट सकते हैं. वैसे भी हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और संघ की जबरदस्त सामाजिक उपस्थिति में भाजपा की इस सोच पर किसी को एतराज नहीं होना चाहिए. इतिहास गवाह है कि इस तरह की सोच या सपना लोकतंत्र के इतिहास में तमाम दलों को होता रहा है. 2014 के संसदीय चुनावों को याद करें तो क्या कांग्रेस भी इसी तरह की सपने में नहीं जी रही थी? मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार पर लगते भ्रष्टाचार व कुशासन के आरोप तब के कांग्रेस सरकार पर लग रहे आरोपों से किस पैमाने पर अलग है? कदाचित कांग्रेस पूरे देश पर शासन कर रही थी जबकि शिवराज का शासन केवल एक प्रदेश तक सीमित है? कांग्रेस के 60 साल के भ्रष्टाचार व कुशासन के बदले भाजपा के भ्रष्टाचार व कुशासन की अवधि अभी 15 साल से ऊपर नहीं है? लेकिन ऐसे सवालों के परिप्रेक्ष्य में एक बात ध्यान में आती है कि क्या तेजी से विकसित होते भारतीय लोकतंत्र में पूरी दुनिया की तरह समय का अंतराल अब छोटा नहीं हो रहा है? अगर आज मध्यवर्गीय युवा को एक अदद नौकरी मिलती है तो उसे अगले ही दिन घर या कार लेना होता है. इसलिए उसका काम 5-10 फीसद वेतन बढ़ोतरी से नहीं चलता. उसे 20 से 40 फीसद का वेतन वृद्धि चाहिए. क्या बीसवीं सदी के पचास या साठ के दशक से आज की तुलना हो सकती है? तब दिल्ली या भोपाल से निकली संदेश या खबरों को देश के कोने-कोने तक पहुंचने में सप्ताह-पखवारे भी नहीं लगते थे? क्या आज प्रदेश में ही भाजपा 2 करोड़ से ज्यादा लोगों को घंटे भर में (व्हाट्सअप के जरिए) अपना संदेश नहीं दे रही? ऐसे में यह भी सवाल उठता है कि लोकतंत्र की किसी इकाई में कैसे कोई पार्टी अपने तमाम सीमाओं को छुपा 20-30 साल शासन करने का सपना देख सकती है? लेकिन मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की स्थिति देखते हुए सत्ताधारी दल के समर्थकों की इस सोच पर भी ऐतराज नहीं होना चाहिए?

भारत को कॉर्पोरेट इंडिया बनाने वाली कांग्रेस में न इसके गुण हैं न चुनाव जीतने का माद्दा. इसके पास न मोदी जैसा ब्रांड नेतृत्व है और न संघ जैसा सामाजिक-सांस्कृतिक अनुषंगी संगठन. इसके पास शिवराज जैसा लोकप्रिय नेता भी नहीं है न ही अमित शाह जैसा पार्टी अध्यक्ष. इसके पास न आज देश भर में शासन करने की भाजपा जैसी हैसियत है न चुनाव जीतने के लिए वैसी धन बल की शक्ति. आदि-आदि. हालांकि यहां यह भी सवाल उठता है कि क्या केवल इन्हीं पैमानों पर किसी लोकतंत्र में सत्ता जीती जाती है? इतिहास बताता है कि ऐसे भरपूर संसाधनों के बावजूद सियासी दल चुनाव हारते रहे हैं. क्या 1977 और 2014 का चुनाव स्वयं कांग्रेस नहीं हारी?

अब कुछ और तथ्यों पर बात कर लें. देश व प्रदेश में ब्रांड मोदी व शिवराज की गिरती प्रतिष्ठा और सरकार की आर्थिक और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर लगातार असफलता से मध्य प्रदेश में भाजपा की स्थिति खराब है. दूसरी ओर अध्यक्ष पद पर बैठने के बाद से राहुल गांधी की अति सक्रियता खास तौर पर प्रदेश में देखते हुए तो लगता है कि भाजपा के लिए मध्य प्रदेश का ये चुनाव पिछले चुनावों से ज्यादा खराब है. खबरों के मुताबिक़ आसन्न हार की डर से भाजपा व संघ के सर्वे के आधार पर 70 से ज्यादा विधायकों के टिकट काटे जा रहे हैं. पार्टी को उम्मीद है कि नए फेस से सत्ता विरोधी लहर को कम किया जा सकता है. अतीत में भी भाजपा ने इस आधार पर अपनी कई सीटें बचाई है. लेकिन महंगाई और रोजगार दो ऐसे मुद्दे हैं जिस पर केंद्र की सरकार के बड़े-बड़े दावों के बावजूद बहुत कुछ नहीं हुआ है. मध्य वर्ग के लिए ये दोनों बेहद अहम् मुद्दे हैं जिस पर मध्य प्रदेश में भी अच्छी-खासी असंतुष्टि देखी जा सकती है. 2014 के संसदीय चुनाव में इन दो मुद्दों पर भाजपा को जबरदस्त समर्थन मिला था और वह दो संसदीय सीटों को छोड़ समस्त सीटें जीतने में कामयाब रही थी. लेकिन इस बार प्रदेश के चुनाव में ये दो मुद्दे मतदाताओं के सामने अहम् है. लेकिन भाजपा के पास इसके लिए कोई समुचित उत्तर नहीं है इसलिए वे मतदाताओं को अन्य मुद्दों पर उलझाना चाहती है. अगर कांग्रेस इन दोनों मुद्दों को सही परिप्रेक्ष्य में आम जनता के बीच लाने में सफल रहती है तो उसके हाथ में बाजी आने से कोई रोक नहीं सकता. 2003 में दालितों के लिए दिग्विजय सरकार की अति सक्रियता ने चुनाव की दिशा बदली थी. भाजपा ने पिछड़ों वर्ग से आने वाली उमा भारती को सामने रख और बिजली-सड़क मुद्दे को उठा कर कांग्रेस से सत्ता छीन ली थी. इसलिए 15 साल के भाजपा के (कु)शासन व भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि में कांग्रेस महंगाई और रोजगार के मुद्दे को आगे कर चुनाव लड़ती है तो कोई दो राय नहीं होना चाहिए कि भाजपा के लिए सत्ता की राह आसान नहीं होगी.

फिलहाल मध्य प्रदेश में कांग्रेस अपने कुछेक नेताओं के स्थानीय जनाधार और दूसरी पार्टियों से दल-बदलू नेताओं के भरोसे ही चुनाव लड़ रही है. लेकिन यदि ये एक कमजोरी है तो दूसरी ओर भाजपा के 15 साल के शासन की कारगुजारियों के कारण मजबूती भी है. चुनावों में जब भी कोई लहर नहीं होती तो उम्मीदवार महत्वपूर्ण हो जाता है. ऐसे में देखने की बात केवल ये है कि कांग्रेस चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में कैसे आमलोगों तक भाजपा सरकार की इन तमाम कमियों व सीमाओं को पहुंचा पाती है. हालांकि सोशल मीडिया पर कांग्रेस ने बहुत हद तक अपनी कमजोरी दूर कर ली है और भाजपा को जबरदस्त टक्कर दे रही है लेकिन राज्य में गांव-गांव बूथ मैनेजमेंट के मामले में यह भाजपा से काफी पीछे है. इसी तरह प्रदेश में कांग्रेस नेतृत्व कई गुटों में बंटा हुआ है. इसलिए नेतृत्व के लिए कांग्रेस अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी पर ही निर्भर है.

हालांकि ये बात भी सच है कि प्रदेश में भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बावजूद शिवराज सिंह आम जनता में पक्ष-विपक्ष के तमाम नेताओं में सर्वाधिक लोकप्रिय बने हुए हैं. पर भाजपा के अपने कैडर में उनके खिलाफ ज्यादा आक्रोश है और पिछले दो चुनावों की तुलना में कर्मचारी वर्ग में भी आक्रोश बढ़ा हुआ है इसलिए उनका रास्ता उतना आसान नहीं जितना भाजपा समर्थक लोग दावा करे रहे हैं. सरकार में होने के कारण शिवराज के पास प्रचार-प्रसार के लिए ज्यादा लाव-लश्कर हैं और उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निष्ठावान कार्यकर्ताओं का साथ भी है इसलिए ऊपरी तौर पर भाजपा की दावेदारी ज्यादा मजबूत बताई जा रही है. लेकिन पिछले एक महीने में शिवराज के जन आशीर्वाद यात्रा हो या भोपाल में आयोजित कार्यकर्ता महाकुंभ, दावों के विपरीत बहुत कम संख्या में लोगों की उपस्थिति इस बात को पुष्ट करती है कि अब उनके पास भी वो जादू नहीं है जो पिछले चुनावों में था.

खेती-किसानी के मोर्चे पर मिली शुरुआती बढ़त ही शिवराज के लिए अंतिम दो साल से काल बन रहा है. राज्य में सोयाबीन, कपास और प्याज की खेती करने वाले किसानों का असंतोष शिवराज की सरकार के लिए सिरदर्द बना हुआ है. फसलों के समर्थन मूल्य और बाजार मूल्य के अंतर के भुगतान के लिए शुरू भावांतर योजना के लिए सरकार के खजाने में पैसा नहीं है. मालवा-निमाड़ अंचल में किसानों की समस्या से उत्पन्न मंदसौर कांड की गूंज अभी भी कायम है. उस आंदोलन के दौरान पुलिस की गोलियों से छह किसानों की मौत हो गई थी. इस साल बरसी पर मंदसौर आकर राहुल गांधी ने शासन में आने के 10 दिनों के अन्दर किसानों के ऋण माफ़ करने की जो घोषणा की उसे लोग बार-बार याद कर रहे हैं. आर्थिक मोर्चे पर मध्यप्रदेश की हालत ज्यादा ख़राब है. दो लाख करोड़ रुपए से अधिक कर्ज वाली सरकार अपने कर्मचारियों को वेतन बांटने के लिए हर दूसरे-तीसरे महीने इधर-उधर से कर्ज लेकर काम चला रही है. महिलाओं पर अत्याचार और मासूमों से बलात्कार के मामले में राज्य का लगातार सुर्ख़ियों में बने रहना, इस चुनाव में भाजपा के सामने चुनौती बनी हुई है. इससे इतर आम लोग व्यापम और केंद्र के राफेल विमान खरीद घोटाले पर चौक-चौराहों पर खुली बहस कर रहे हैं. वे इस बात से भी नाराज हैं कि अधिकारियों को भ्रष्टाचार की खुली छूट मिली है और बहुत सारे मामले में इसके लिए मुख्यमंत्री आवास को जिम्मेदार माना जाता है. चंबल और नर्मदा क्षेत्र में सवर्ण तबका एससी/एसटी एक्ट पर केंद्र सरकार के पलटी मारने पर भाजपा से बेहद नाराज है. नाराजगी इतनी ज्यादा है कि सवर्ण कर्मचारी संगठन सपॉक्स अब बाकायदा राजनीतिक दल की शक्ल ले चुका है और सभी 230 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने के फेर में है. एससी-एसटी अत्याचार निरोधक कानून पर सबसे ज्यादा विरोध भी भाजपा और उसके नेताओं का ही हो रहा है. लेकिन सवर्णों के विरोध के लिए अकेले एससी-एसटी अत्याचार निरोधक कानून ही नहीं है. मध्यप्रदेश में सवर्णों के इस गुस्से की एक कहानी है. कांग्रेस शासन में 2002 में एससी-एसटी को पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए कानून बनाया गया था. इसको हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. 30 अप्रैल 2016 को जबलपुर हाईकोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया और 2002 से 2016 तक के तमाम पदोन्नति को रद्द करने के आदेश दिए. हाईकोर्ट के इस फैसले के विरोध में एससी-एसटी के संगठन, अजाक्स के सम्मेलन में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने मंच से कहा था कि हमारे होते हुए कोई माई का लाल आरक्षण समाप्त नहीं कर सकता. फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. शिवराज सरकार के इस रवैये से अनारक्षित वर्ग के कर्मचारियों में नाराजगी पहले से ही बनी हुई थी. ताजा विवाद में शिवराज द्वारा दिया गया “माई का लाल” बयान को सवर्णों ने पकड़ लिया है. 2016 में ही शिवराज सरकार के दलितों के पुरोहित बनाने के फैसले को लेकर भी विवाद की स्थिति बनी थी. इसके तहत एससी की आर्थिक व सामाजिक उन्नति के लिए दलित युवाओं को अनुष्ठान, कथा, पूजन और वैवाहिक संस्कार का प्रशिक्षण दिया जाएगा. इस फैसले का ब्राह्मण समाज द्वारा तीखा विरोध किया गया था. उपरोक्त कारणों से मध्यप्रदेश में सरकारी कर्मचारियों का जाति के आधार पर विभाजन हो गया है जिसमें एक तरफ सपाक्स के बैनर तले सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग के कर्मचारी है तो दूसरी तरफ अजाक्स के बैनर तले अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के कर्मचारी हैं. प्रदेश में करीब 7 लाख सरकारी कर्मचारी हैं जिसमें अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के कर्मचारियों की संख्या करीब 35 फीसदी और सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग के कर्मचारियों की संख्या 65 फीसदी बतायी जाती है. इसलिए सपाक्स की नाराजगी शिवराज और भाजपा पर भारी पड़ सकती है. सपाक्स चित्रकूट, मुंगावली और कोलारस विधानसभा के उपचुनाव में सरकार के खिलाफ अभियान चला चुका है.
इन जमीनी हकीकत के अलावा पिछले दो चुनावों में भाजपा के सबसे बड़े चुनावी रणनीतिक नेता अनिल माधव दवे अब इस दुनिया में नहीं हैं और दूसरे रणनीतिक नेता नरेन्द्र सिंह तोमर की सहभागिता बहुत सीमित हो गई है. यहां तक की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष होने के बावजूद तोमर को अपनी बेटी को सीट दिलाने के लिए भी एड़ी-चोटी का जोड़ लगाना पड़ रहा है. इसके साथ ही नरेंद्र मोदी व अमित शाह की नाराजगी के कारण भी शिवराज के नेतृत्व की धमक बहुत फीकी हो गई है. हां, एक बात जरूर है कि चुनाव में संघ के आगे बढ़कर सक्रिय होने के कारण भाजपा की स्थिति जरूर पहले से बेहतर दिख रही है. लेकिन संघ की इस भूमिका को शिवराज समर्थक कई पत्रकार बहुत नकारात्मक दृष्टि से देख रहे हैं.

उधर, प्रदेश भाजपा को केंद्र सरकार के फैसले तकलीफ में डाले हुए हैं, जिसके चलते भाजपा के चुनाव प्रचार अभियान से केंद्र की उपलब्धियां और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ज़िक्र बिल्कुल गायब लगता है. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह यूं तो भाजपा के स्टार प्रचारक हैं लेकिन भाजपा के प्रचार अभियान में केंद्र और मोदी नहीं दिखाई दे रहे हैं. भाजपा के गढ़ मालवा में अमित शाह के कार्यक्रम बहुत फीके रहे. उन्हें सपाक्स और करणी सेना का जबरदस्त विरोध झेलना पड़ा था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर भी प्रदेश में कोई उत्साह नहीं. अपितु नोटबंदी, जीएसटी, एससी-एसटी बिल, पेट्रोल-डीज़ल के बढ़े हुए दाम जैसे मामलों के कारण काफी विरोध है.
कुल मिलाकर, आम लोग, कर्मचारियों व समाज विशेष की नाराजगी इस बार भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. इसके अलावा छोटे राजनीतिक दल सपाक्स पार्टी, जयस, सवर्ण समाज पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सीपीआई, सीपीएम, गोंगपा, बसपा, सपा केवल कांग्रेस का नहीं, अपितु भाजपा का गणित ज्यादा बिगाड़ेंगे. अगर भाजपा ऐसी परिस्थिति में अपना वोट प्रतिशत बरकरार रख पाई, तभी सत्ता में लौटेगी. इसलिए यह कहा जा सकता है कि भाजपा के जीत के बड़े-बड़े दावों में कई लोचें हैं.

जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो इसके नेता लगभग तीन प्रमुख गुट में बंटे नजर आ रहे हैं. एक तरफ चंबल व गुना में मजबूत ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं तो दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह नेपथ्य में अपने कद का अहसास जताने से चूक नहीं रहे हैं. तीसरी ओर प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ हैं. कमलनाथ के मध्य प्रदेश कांग्रेस का कमान संभालने से पूर्व तक ये माना जा रहा था कि ज्योतिरादित्य को ही प्रदेश की कमान दी जा सकती है. उम्र और उर्जा के हिसाब से वे इसके लिए सबसे उपयुक्त दावेदार भी थे लेकिन किन्ही कारणवश केंद्रीय नेतृत्व ने उनपर भरोसा करने के बदले अबतक गुटबाजी से ऊपर रहे 70 वर्षीय कमलनाथ को कमान थमा दी. शुरू में कमलनाथ ने गुटबाजी पर रोक लगाने में कामयाबी हासिल भी की लेकिन शिवराज और भाजपा के नजर में कांग्रेस के सबसे विवादित लेकिन लोकप्रिय नेता दिग्विजय सिंह की सक्रियता के कारण कई जगह कमलनाथ का कद छोटा होता दिखा. दूसरी ओर ज्योतिरादित्य की कम सक्रियता के कारण भी कमलनाथ प्रभावी चुनावी रणनीति बना पाने में सफल नहीं हो पाएं हैं. फिलहाल जिस तरह का असंतोष आज शिवराज सरकार को लेकर मध्य प्रदेश में है कुछ ऐसा ही वातावरण 2003 के चुनाव में दिग्विजय सिंह के खिलाफ था. इस असंतोष को अपनी अति सक्रियता और आक्रामकता से उमा भारती जैसी तेज-तरार नेता ने भाजपा के पक्ष में कर लिया था. संयोग से कमलनाथ के नेतृत्व में ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है.
कांग्रेस के राह में एक और खतरा बसपा, सपा, गोडवाना पार्टी के साथ समझौता नहीं होना है. बसपा उत्तर प्रदेश से सटे चंबल के भिंड-मुरैना और विंध्य क्षेत्र के रीवा-सतना जिलों में अपना प्रभाव रखती है. हालांकि राज्य के कुछ अन्य जिलों में भी पार्टी का कैडर स्थित है लेकिन वहां वह चुनाव में कुछ बदलाव करने की स्थति में नहीं है. इस चुनाव में बसपा इस साल 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के एसटी अत्याचार निरोधक कानून को लेकर दिये गये अपने फैसले से दलितों में उपजी नाराजगी को भुनाने के फेर में है. इस निर्णय के बाद अप्रैल में भिंड व मुरैना में दलितों के एक हिंसक विरोध प्रदर्शन में 8 लोग मारे गए थे. राज्य में 21 फीसद अनुसूचित जाति निवास करते हैं और उनके लिए 37 सीटें अरक्षित हैं. बसपा व कांग्रेस के अलग-अलग चुनाव लड़ने के कारण इसमें से 25 सीटों पर पिछले चुनाव में भाजपा जीती थी. लेकिन 2017 के भिंड व चित्रकूट उपचुनावों में बसपा के उम्मीदवारों की अनुपस्थिति में कांग्रेस ने बहुत आसानी से भाजपा को हराया था. इसी तरह भिंड-मुरैना के कुछ सीटों पर सपा का भी प्रभाव है.

उधर गोंडवाना पार्टी का प्रभाव 47 आदिवासी बहुल सीटों पर है. इसके बावजूद कांग्रेस बसपा, सपा या गोंडवाना पार्टी के साथ चुनावी ताल-मेल करने में असफल रही है. तमाम सत्ता विरोधी लहर के बावजूद अगर कांग्रेस इस चुनाव में हारती है तो विपक्षी वोटों का बिखराव बहुत बड़ा मुद्दा बनेगा. पिछले चुनाव में भी भाजपा की जीत में विपक्षी वोटों का बिखराव बहुत बड़ा कारण माना गया था. इस बार तो आदिवासियों के सामाजिक-सांस्कृतिक उत्थान के लिए काम कर रही जयस भी अपने उम्मीदवार उतारने के लिए उतावली है. फिलहाल वह कांग्रेस से 15 सीटें मांग रही है. अगर कांग्रेस इनके साथ समझौता करने में भी विफल रहती है तो मालवा-निमाड़ क्षेत्र की 68 सीटों पर भाजपा 2013 के परिणाम दोहरा सकती है. इस बार के चुनाव में भी जीत-हार का फैसला भाजपा के गढ़ मालवा और मध्य क्षेत्र ही निश्चित होगा. इस क्षेत्र में 86 सीटें है. कांग्रेस के लिए असल चुनौती इन्हीं दोनों इलाके के उज्जैन, इंदौर और भोपाल सहित 10 बड़े जिलों की सीटें हैं. 2013 के विधानसभा चुनाव में इन 86 सीटों में से कांग्रेस महज 10 सीटें ही जीत सकी थी. इन दोनों क्षेत्रों में भाजपा 50 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करने में कामयाब रही थी. मालवा क्षेत्र में 50 सीटों में से फ़िलहाल भाजपा के पास 45 सीटें है. जबकि कांग्रेस के पास महज चार सीटें हैं. हालांकि भाजपा का ये दुर्ग दरकता हुआ नजर आ रहा है. पिछले साल मालवा इलाके के मंदसौर में किसान आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में कई किसानों की मौत हो गई थी. इसलिए कांग्रेस को इस क्षेत्र में अपनी उम्मीद नजर आ रही है. इसके अलावा उज्जैन इलाके में सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी भी भाजपा के लिए नई मुसीबत बनी हुई है.

मालवा इलाका काफी धार्मिक क्षेत्र माना जाता है. इसलिए मुख्यमत्री शिवराज सिंह चौहान ने अमित शाह की मौजूदगी में उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर से अपनी जनआशीर्वाद यात्रा आरंभ की थी. अब कांग्रेस अध्यक्ष ने भी इस मंदिर में अपना माथा टेका है. ज्योतिरादित्य सिंधिया और प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने चुनाव अभियान के शुरुआत में ही ऐसा कर लिया था. हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने केवल उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में माथा नहीं टेका है बल्कि वे गुजरात की तर्ज पर मध्य प्रदेश के हर दौरे में एक न एक प्रमुख मंदिर जाकर माथा टेकना अपना धर्म बना लिया है. राहुल ने चित्रकूट के कामतानाथ मंदिर में पूजा अर्चना करके विंध्य क्षेत्र में चुनावी अभियान की शुरुआत की थी. कांग्रेस ने उसी मंदिर से भगवान राम द्वारा राम गमन पथ यात्रा की 2 अक्टूबर से शुरू की. जबकि चंबल-ग्वालियर दौरे की शुरुआत उन्होंने मां पीताम्बरा देवी के दर्शन से किया. इसके अलावा जबलपुर की यात्रा के दौरान भी राहुल ने नर्मदा आरती की थी. इन सबसे कांग्रेस ने भाजपा के हिंदुत्व मुद्दे को बहुत हद तक शांत किया है. अब भाजपा से उच्च जातियों की नाराजगी और बसपा से गठबंधन का न होने से कांग्रेस को लगता है कि ब्राहमण मतदाता पार्टी में वापसी कर सकते हैं.
हालांकि प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की उत्तर प्रदेश, असम और बंगाल जैसे राज्य की तरह निर्णायक भूमिका नहीं होने के कारण यहां के चुनाव में इन पर ज्यादा बात नहीं होती. लेकिन इस बार कांग्रेस-भाजपा दोनों दलों की नजरें इनके वोटों पर है. यही वजह है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मोती मस्जिद में जाकर मन्नतें मांग रहे हैं. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए बोहरा मुस्लिमों के आगे सजदा कर रहे हैं. मध्यो प्रदेश में करीब 8 फीसदी मुसलमान हैं. राज्य में करीब दो दर्जन विधानसभा सीटें मुस्लिम बहुल हैं. इसके अलावा एक दर्जन सीट पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में है. बावजूद इसके राज्य में विधानसभा के 230 विधायकों में सिर्फ एक ही मुस्लिम विधायक है. मुस्लिम मतदाता आमतौर पर कांग्रेस का समर्थक समझा जाता था, लेकिन 1967 के गैरकांग्रेसवाद की राजनीति के दौर से मुसलमानों ने कांग्रेस का बीच-बीच में साथ छोड़ा है. हालांकि इस बार मध्य प्रदेश में मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के साथ है. इसका असर भी इस चुनाव में देखा जाएगा.

अब वोटों पर एक नजर डालें. वर्ष 1993 से 2013 तक के वोटिंग आंकड़ों पर नजर डालें, तो भाजपा और कांग्रेस को मिले वोटों की संख्या में ज्यादा अंतर नहीं रहा है, लेकिन 1998 तक कांग्रेस महज एक और दो फीसदी वोटों के अंतर से सरकार बना रही थी और 2003 के बाद भाजपा ने यह सिलसिला जारी रखा. 2003 में जरूर भाजपा की जीत का अंतर ज्यादा था. तब भाजपा को 42.50 फीसदी वोट मिले थे जबकि कांग्रेस को 31.59 फीसदी ही वोट मिले थे. तब भाजपा को 173 सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस की सीटें 38 पर सिमट गई थी. लेकिन वर्ष 2008 में स्थिति बदली और 2003 की नायिका उमा भारती ने अलग पार्टी बना भाजपा को नुकसान पहुंचाया. भाजपा 173 से घटकर 143 पर रह गई जबकि कांग्रेस की सीटों की संख्या 38 से बढ़कर 71 हो गई. इस बार बसपा ने भी भाजपा को नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. 2008 के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के वोटिंग प्रतिशत में महज 4.86 का अंतर था. तब इन्हें क्रमश: 37.24 और 32.38 फीसदी वोट मिले थे. लेकिन वर्ष 2013 में यह अंतर बढ़कर लगभग दोगुना यानी 8.49 फीसदी हो गया. इस साल भाजपा ने वोट प्रतिशत और सीटें दोनों बढ़ाए. पार्टी ने 44.87 फीसदी वोट लेकर 165 सीटें हासिल कीं जबकि कांग्रेस 36.38 फीसदी वोट लेकर मात्र 58 सीटों के साथ फिर से घाटे में आ गई. पिछले चुनाव की तुलना में कांग्रेस को 13 सीटों का नुकसान हुआ था. वर्ष 1998 में कांग्रेस ने 40.63 फीसदी वोट और 172 सीटें लेकर दूसरी बार सरकार बनाई थी. तब भाजपा को 39.03 फीसदी वोट और 119 सीटें मिली थीं. वर्ष 1990 में राम लहर में भी भाजपा ने वोटों में 5.51 फीसदी की बढ़त बनाई थी. तब भाजपा को 39.04 और कांग्रेस को 33.53 फीसदी वोट मिले थे.

इस तरह से देखें तो वास्तव में मप्र में जीत के लिए कांग्रेस को 5-6 फीसद वोटों की ही स्विंग चाहिए. हालांकि ये एक नजर में आसान नहीं दिख रहा है लेकिन भाजपा शासन के खिलाफ तमाम भ्रष्टाचार के आरोपों और शासन की नाकामयाबियों के मद्देनजर कांग्रेस चुनाव के अंतिम दौर में भी आम जनता तक ये संदेश पहुंचाने में सफल होती है तो भाजपा व संघ की तमाम दावे व कोशिशें धरी की धरी रह सकती है. चुनावों में अभी एक महीना बाकी है और मध्य प्रदेश के वर्तमान हालात के मद्देनजर ये कहना उचित होगा कि मतदाताओं के रुझानों में इस दौरान कुछ भी बदलाव हो सकता है. इसलिए अंतिम चुनाव नतीजे किसी भी पार्टी के पक्ष में जा सकते हैं.

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