Home Political Samachar भगवान परशुराम की भारत जैसे देश में सदैव प्रासंगिकता बनी रहेगी

भगवान परशुराम की भारत जैसे देश में सदैव प्रासंगिकता बनी रहेगी

भगवान परशुराम की भारत जैसे देश में सदैव प्रासंगिकता बनी रहेगी. मुख में वेद, पीठ पर तरकश, कर में कठिन कुठार, भारत के युवाओं को भगवान परशुराम से न केवल शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए, बल्कि उनको लेकर जो कहानियां गढ़ी गई हैं, उनके मूल तत्व को समझना चाहिए. त्रेता से लेकर द्वापर युग तक भगवान परशुराम का प्रभाव रहा. पौराणिक आख्यानों में इसका उल्लेख भी मिलता है. भगवान परशुराम भगवान विष्णु के पांचवें अवतार थे. उनके पिता का नाम महर्षि जमदाग्नि और माता का नाम था साध्वी रेणुका. वह सरस्वती नदी के तट पर विशाल आश्रम में निवास करते थे. भृगुवंशी ॠषि जमदाग्नि के पांच पुत्र थे. इनमें रुक्मदान, सुखेश, वसु, विश्ववासन और राम थे. दरअसल, राम को ही बाद में परशुराम नाम मिला और इसके पीछे की कहानी भी पुराणों में बताई गई है. महर्षि जमदाग्नि परम तपस्वी थे. उन्होंने अपने इस पुत्र राम में अलौकिक क्षमता का आभास किया और भगवान शंकर के पास शस्त्र विद्या और अन्य कलाओं को सीखने के लिए भेज दिया. भगवान शंकर के यहां राम भी पुत्र की तरह रहते, खेलते और सीखते थे.

शास्त्रों में उल्लेख है कि एक बार किसी बात पर राम का शंकर के पुत्र गणेश से झगड़ा हो गया. राम ज़्यादा हृष्ट-पुष्ट थे, इसलिए उन्होंने गणेश को ज़मीन पर पटक दिया. उसी समय गणेश का एक दांत टूट गया. इस घटना के बाद गणेश जी का एक नाम एक दंत पड़ा. मां पार्वती ने शंकर जी से शिकायत की कि तुम्हारे शिष्य ने मेरे बेटे का दांत तोड़ दिया है, तो शंकर भगवान ने कहा कि यह भी तो मेरा बेटा है. गुरु और शिष्य का रिश्ता कैसा होता है, इससे शिक्षा लेनी चाहिए. वहीं से राम ने गणेश का परशु भी छीन लिया था और तब शंकर भगवान ने उनको नाम दिया परशुराम. यही परशुराम आगे चलकर महान तपस्वी और वीर योद्धा बने. ऐसा उल्लेख मिलता है कि जब भगवान परशुराम आश्रम में लौट आए, तो एक दिन उनकी माता सरस्वती नदी में स्नान करने गई थीं. उसी समय वहां एक राजा चित्ररथ स्नान करने आए थे. राजा बहुत सुंदर थे और रेणुका उन पर आसक्त हो गईं. महर्षि जमदाग्नि को जब यह बात तपोबल से ज्ञात हुई, तो वह रेणुका पर क्रोधित हुए और अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि मां का सिर काट कर ले आओ. परशुराम को छोड़कर शेष पुत्रों ने मां के स्नेह के कारण पिता की आज्ञा मानने से इंकार कर दिया.

परशुराम ने पिता की आज्ञा मानकर मां रेणुका का सिर काट कर पिता के चरणों में रखा. महर्षि जमदाग्नि इससे बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने अपने चार पुत्रों को चेतना शून्य होने का श्राप दिया, और परशुराम से कहा, बेटा जो कुछ मांगना है, मांग लो. परशुराम ने पिता से तीन वरदान मांगे. पहला, मां को जीवित कर दो, दूसरा, मां की मौत कैसे हुई, इसका मां को ज्ञान न रहे और तीसरा, संग्राम में उनको कोई पराजित न कर सके. इस प्रकार परशुराम अजेय योद्धा बन गए.

उसी समय की बात है कि राजा कार्तिकेय अर्जुन (सहस्त्रबाहु) एक दिन महर्षि जमदाग्नि के आश्रम में पहुंचे. महर्षि ने अपनी कामधेनु गौ की सहायता से राजा का भरपूर आतिथ्य-सत्कार किया. राजा के मन में लोभ आ गया और उसने महर्षि जमदाग्नि से कहा कि यह गाय मुझे दे दो. महर्षि ने गाय देने से मना कर दिया. इस पर राजा ने क्रोध में आकर महर्षि जमदाग्नि का सिर काट दिया. उस समय आश्रम में परशुराम नहीं थे. वह लौटकर आए, तो सारी बात पता चली. मां रेणुका रो रही थीं. उन्होंने सहस्त्रबाहु का वध करके पिता की हत्या का बदला लिया. इसके बाद अन्याय करने वाले अन्य क्षत्रिय राजाओं को भी अपने परशु (फरसे) से काट डाला. उन्होंने यह काम किसी लालच में नहीं किया था, बल्कि समाज के हित में किया था. राजाओं से छीना गया राजपाट ़खुद नहीं भोगा, न्यायप्रिय ब्राह्मणों और पात्रों को दान कर दिया. इस प्रकार अन्याय से लड़ने और न्याय की स्थापना करने वाले भगवान परशुराम ने अयोध्या में राम का अवतार होने और धनुष यज्ञ के समय उनको परख कर उन्हें क्षत्रिय कुल भूषण की उपाधि दी और फिर तपस्या करने वन में चले गए. द्वापर में भीष्म जैसे राजा को शस्त्र ज्ञान कराया. भगवान पराशुराम आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि समाज में अत्याचार बढ़ता जा रहा है. अन्याय करने वाले इतने सशक्त और प्रभावशाली हो गए हैं कि उनके लिए परशुराम जैसे युवा की ही ज़रूरत है.

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