Home Political Samachar एक थप्पड़ ने बनाया शहाबुद्दीन को नेता से बाहुबली

एक थप्पड़ ने बनाया शहाबुद्दीन को नेता से बाहुबली

एक समय राजद के पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन अपने समर्थकों व विरोधियों के बीच रॉबिनहुड के रूप में जाने जाते थे। तब सीवान में कानून का राज नहीं बल्कि शहाबुद्दीन का शासन चलता था। आपको बताते चलें कि 15 मार्च 2001 में ही पुलिस जब राजद के एक नेता के खिलाफ एक वारंट पर गिरफ्तारी करने दूसरे दिन दारोगा राय कॉलेज में पहुंची तो शहाबुद्दीन ने गिरफ्तार करने आए अधिकारी संजीव कुमार को ही थप्पड़ मार दिया था। उनके सहयोगियों ने पुलिस वालों की जमकर पिटाई कर दी थी। इसके बाद बिहार पुलिस शहाबुद्दीन पर कार्रवाई की कोशिश में उनके प्रतापपुर वाले घर पर छापेमारी की, लेकिन अंजाम बेहद ही दुखद रहा था।

शहाबुद्दीन समर्थक व पुलिस के बीच करीब तीन घंटे तक दोनों तरफ से हुई गोलीबारी में आठ ग्रामीण मारे गए थे। इसके बाद पुलिस को खाली हाथ बैरंग लौटना पड़ा था। तभी से शहाबुद्दीन की गिनती सीवान की नहीं बल्कि प्रदेश व देश स्तर पर भी एक राजनेता से इतर बाहुबली के रूप में होने लगी। हालांकि इस संगीन वारदात के बाद भी शहाबुद्दीन के खिलाफ कोई मजबूत केस नहीं बनाया गया था। यह अलग बात है कि तत्कालीन डीएम सीके अनिल व एसपी रत्न संजय ने 2005 के अप्रैल में शहाबुद्दीन के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें कानून के शिकंजे में कस दिया था।

2003 में डीपी ओझा ने कसा था शिकंजा शहाबुद्दीन पर

मो. शहाबुद्दीन को लंबे समय तक राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद का राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा और आज भी उनके साथ ही है। हालांकि 2003 में डीपी ओझा ने डीजीपी बनने के साथ ही शहाबुद्दीन पर शिंकजा कसना शुरू कर दिया। उन्होंने शहाबुद्दीन के खिलाफ सबूत इकट्टे कर कई पुराने मामले फिर से खोल दिए।

इन मामलों की जांच का जिम्मा सीआईडी को सौंपा गया था, उनकी भी समीक्षा कराई गई। माले कार्यकर्ता मुन्ना चौधरी के अपहरण व हत्या के मामले में शहाबुद्दीन के खिलाफ वारंट जारी हुआ और उन्हें अदालत में आत्मसर्पण करना पड़ा। शहाबुद्दीन के आत्मसमर्पण करते ही सूबे की सियासत गरमा गई और मामला आगे बढ़ता देख राज्य सरकार ने डीपी ओझा को ही डीजीपी पद से हटा दिया गया।

चार बार सांसद और दो बार रहे विधायक

एक बाहुबली से राजनेता बनने का मोहम्मद शहाबुद्दीन का सफर बड़ा ही दिलचस्प रहा है। बिहार में कभी अपराध का बड़ा नाम रहे शहाबुद्दीन का जन्म 10 मई1967 को सीवान जिले के हुसैनगंज प्रखंड के प्रतापपुर गांव में हुआ था। सीवान के चार बार सांसद और दो बार विधायक रहे शहाबुद्दीन ने कॉलेज के दौरान अपराध की दुनिया का दामन थाम लिया था।

1980 में डीएवी कॉलेज से राजनीति में कदम रखने वाले इस नेता ने माकपा व भाकपा (माक्र्सवादी – लेनिनवादी) के खिलाफ जमकर लोहा लिया और इलाके में ताकतवर राजनेता के तौर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। भाकपा माले के साथ उनका तीखा टकराव रहा। सीवान में दो ही राजनीतिक धुरिया थीं तबएक शहाबुद्दीन व दूसरा भाकपा माले। 1993 से 2001 के बीच सीवान में भाकपा माले के 18 समर्थक व कार्यकर्ताओं को अपनी जान गंवानी पड़ी। जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर व वरिष्ठ नेता श्यामनारायण भी इसमें शामिल थे। इनकी हत्या सीवान शहर में 31 मार्च 1997 को कर दी गई थी। इस मामले की जांच सीबीआई ने की थी।

1986 में दर्ज हुआ पहला केस

सीवान के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन पर 1986 में हुसैनगंज थाने में पहला आपराधिक केस दर्ज हुआ। फिर तो इसके बाद उनके खिलाफ लगातार मामले दर्ज होते चले गए। इस वजह से देश की क्रिमिनल हिस्ट्रीशीटरों की लिस्ट में वे शामिल हो गए। 1990 में निर्दलीय विधायक बनने के बाद शहाबुद्दीन लालू प्रसाद के नजदीक चले गए। फिर विधायक और सांसद भी बने।

एसपी पर भी चलाई थी गोली

1996 में लोकसभा चुनाव के दिन ही एक बूथ पर गड़बड़ी फैलाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार करने निकले तत्कालीन एसपी एसके सिंघल पर गोलियां चलाई गई। आरोप था कि खुद शहाबुद्दीन ने गोलियां दागी और सिंघल को जान बचाकर भागना पड़ा। इस कांड में शहाबुद्दीन को दस वर्ष की सजा हो चुकी है।

अक्सर लालू से नाराज होते थे शहाबुद्दीन

1990 से लेकर 2005 तक राजद की सरकार में शहाबुद्दीन के रिश्ते लालू से बनते बिगड़ते रहे हैं। बावजूद शहाबुद्दीन ने कभी पार्टी नहीं छोड़ी। तत्कालीन डीजीपी डीपी ओझा ने शहाबुद्दीन पर कार्रवाई करनी शुरू कर दी तो सरकार और शहाबुद्दीन के बीच सीधी जंग छिड़ने की नौबत आ गई थी। अंतत: डीपी ओझा ने शहाबुद्दीन पर मुन्ना चौधरी अपहरण कांड में गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया। नतीजतन शहाबुद्दीन को इस केस में 13 अगस्त 2003 को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के कोर्ट में सरेंडर करना पड़ा था। उसी की मार आज शहाबुद्दीन झेल रहे हैं। इसी क्रम में 2004 में लालू से शहाबुद्दीन नाराज हो गए।

शहाबुद्दीन ने मीडिया के सामने बयान दे दिया था कि उन्होंने राजद से नाता तोड़ लिया। नतीजतन लालू को सीवान सदर अस्पताल में भर्ती के दौरान शहाबुद्दीन से मिलना पड़ा था। इसके बाद शहाबुद्दीन ने पार्टी छोड़ने से मीडिया से इनकार कर दिया। फिर उसके बाद से दोनों में मधुर रिश्ते बन गए। लालू ने उस मनमुटाव को दूर करने के लिए सीवान पहुंचने पर सिर्फ इतना ही कहा था कि सीवान का सांसद मेरा छोटा भाई है, मिलने आया था। सरकार बदलने के बाद भी लालू शहाबुद्दीन से मिलने जेल के अंदर गए थे। 16 मार्च 2001 को प्रतापपुर कांड के दौरान भी शहाबुद्दीन लालू से नाराज हो गए थे। उस दौरान इस घटना के बाद भाजपा शहाबुद्दीन को अपनी पार्टी में मिलाने के लिए आतुर थी।

तभी भाजपा के एक बड़े नेता ने बयान दिया था कि सांसद के घर पर हमला नहीं बल्कि लोकतंत्र पर हमला है। उसके बाद लालू सात दिन के बाद शहाबुद्दीन के गांव पहुंचे और सभी मामलों को सीआईडी कंट्रोल के हवाले कर दिया और तत्काल प्रभाव से सीवान के एसपी बच्चू सिंह मीणा व डीएम रसीद अहमद खां का तबादला कर दिया। तब जाकर मामला शांत हुआ था।

शहाबुद्दीन को जमानत के बाद भी रहना होगा जेल में

राजद के पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। यह वह मामला है जिसमें उन्हें आजतक जमानत नहीं मिली थी। आखिरकार चर्चित तेजाब कांड में दो सहोदर भाइयों की हत्या मामले में उम्रकैद की सजा मिलने के बाद हाईकोर्ट ने जमानत दे दी। बावजूद शहाबुद्दीन जेल से बाहर नहीं आ सकते हैं। जेल से बाहर आने के लिए उन्हें राजीव रौशन हत्याकांड में जमानत लेनी होगी।

चर्चित तेजाब कांड के चश्मदीद गवाह राजीव रौशन की हत्या मामले में आखिरकार हाईकोर्ट ने 3 फरवरी को शहाबुद्दीन की जमानत याचिका को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने इस केस में डायरेक्शन दिया था कि नीचली अदालत से इस मामले की सुनवाई करा ली जाए। चर्चित तेजाबकांड में शहाबुद्दीन को जमानत मिलने के बाद फिर एक बार राजीव रौशन हत्याकांड में जमानत की अर्जी कोर्ट में दाखिल की जाएगी। इससे पहले 11 दिसम्बर 15 को राजीव रौशन के दो भाइयों की हत्या में शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इस मामले में शहाबुद्दीन की ओर से हाईकोर्ट में जमानत अर्जी दाखिल की गई थी। इसपर सुनवाई के बाद बुधवार को कोर्ट से बहुत बड़ी राहत मिल गई है। यह घटना 2004 की है।

तेजाबकांड के चश्मदीद गवाह राजीव रौशन की डीएवी कॉलेज मोड़ पर 16 जून, 14 को साढ़े आठ बजे रात में अपराधियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। राजीव रौशन के पिता चंदाबाबू ने थाने में एफआईआर दर्ज कराई। इसमें जेल में बंद मो. शहाबुद्दीन पर साजिश रचने व उनके पुत्र ओसामा पर गोली मारने का आरोप लगाया गया था। पुलिस ने शहाबुद्दीन को इस मामले में रिमांड कर दिया और उनके पुत्र के बिन्दु पर जांच करने लगी। इस मामले में सीवान कोर्ट से जमानत नहीं मिलने पर हाई कोर्ट में अपील की गई थी, लेकिन जमानत नहीं मिली।

पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन 12 साल से भी अधिक समय से जेल में बंद हैं। तीन दर्जन से अधिक मामले उनपर दर्ज हैं। ट्रायल कोर्ट के गठन के बाद 12 मामलों का फैसला आ चुका है जिसमें आठ मामलों में एक साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो चुकी है। चार मामलों में बरी भी हो चुके हैं। अब राजीव रौशन हत्या मामले को छोड़कर सभी मामलों में शहाबुद्दीन को जमानत मिल चुकी है। यदि 11 मामलों को छोड़ दें तो जेल के अंदर बने ट्रायल कोर्ट में अभी भी 37 मामले लंबित पड़े हैं।

मुझे इंसाफ चाहिए, अभीतक संतुष्ट नहीं

सीवान। तीन बेटों को गंवाने वाले सीवान शहर के व्यवसायी चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू ने कहा कि मुझे इंसाफ चाहिए। अभी तक कि कार्रवाई से मैं संतुष्ट नहीं हूं। तीनों बेटों की हत्या के मामले में सभी आरोपितों को फांसी की सजा नहीं होती है तबतक संतुष्ट होने का सवाल ही नहीं उठता है। वैसे मेरे तीनों बेटों की हत्या की भरपायी भी सजा से नहीं हो सकती है। अभी तक कोर्ट पर जरूर भरोसा है कि आरोपितों को सजा अवश्य मिलेगी।

तेजाब से नहलाकर दो भाइयों की हत्या में शहाबुद्दीन को मिली थी उम्रकैद

कार्यालय संवाददाता, सीवान। तेजाब से नहलाकर दो सहोदर भाईयों की हत्या करने के आरोप में स्पेशल जज अजय कुमार श्रीवास्तव ने 11 दिसम्बर को राजद के पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन को सश्रम आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। साथ ही अन्य आरोपित शेख असलम, राजकुमार साह व मो. आरिफ को भी सश्रम आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए सभी पर जुर्माना लगाया था।

शहाबुद्दीन पर 302 में 20 हजार व 364 ए में 10 हजार व अन्य आरोपितों पर भी 10-10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था। जुर्माना की राशि जमा नहीं करने पर सजा की अवधि बढ़ सकती है। यदि शहाबुद्दीन जुर्माना की राशि नहीं देते हैं तो पांच साल व तीन साल की सजा की अवधि बढ़ जाएगी। सभी दफा भी साथ-साथ चलेगी। इधर तेजाब कांड में चश्मदीद गवाह राजीव रौशन की गवाही को व मोबाइल के कॉल डिटेल को साक्ष्य मानते हुए कोर्ट ने माना है कि शहाबुद्दीन जेल से बाहर जाकर घटना को अंजाम दिए हैं। फोन पर दो लाख की रंगदारी मांगने व जेल से बाहर जाकर प्रतापपुर में शहर के व्यवसायी चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदाबाबू के दो पुत्रों गिरीश राज व सतीश राज का अपहरण कराकर प्रतापपुर में तेजाब से नहालकर हत्या करने की चश्मदीद गवाह राजीव रौशन की गवाही को साक्ष्य मानते हुए शहाबुद्दीन को मंडलकारा में बने स्पेशल कोर्ट ने दफा 302, 201, 364 ए, 120 बी के तहत दोषी करार दिया था। वहीं सह अभियुक्त राजकुमार साह, आरिफ उर्फ सोनू व असलम को दफा 364 ए व 323 में दोषी करार दिया।

शहाबुद्दीन समेत किसी आरोपित को सजा सुनाने के दौरान जमानत नहीं दी गई थी

मालूम हो कि 2004 में 16 अगस्त को राजीव रौशन के दो भाइयों गिरीश कुमार व सतीश कुमार का अपहरण कर हत्या कर दी गई थी। आरोप है कि दोनों को प्रतापपुर ले जाकर तेजाब से नहलाकर हत्या कर दी गई थी। इस कांड के चश्मदीद गवाह राजीव रौशन की भी 16 जून 14 को डीएवी मोड़ पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। तीनों बेटे की मां व व्यवसायी चन्दकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू की पत्नी कलावती देवी ने मुफस्सिल थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी। उस समय एफआईआर में दो आरोपित व पांच अज्ञात थे। हालांकि इन अभियुक्तो का अलग मुकदमा चल रहा है। 2009 में सीवान के तत्कालीन एसपी अमित कुमार जैन के निर्देश पर केस के आइओ ने शहाबुद्दीन, असलम, आरिफ व राज कुमार साह को अप्राथमिकी अभियुक्त बनाया था। उसके बाद शहाबुद्दीन को रिमांड पर लेने के लिए पुलिस ने कोर्ट में आवेदन दाखिल किया। कोर्ट ने 09.09.2009 को शहाबुद्दीन को रिमांड पर ले कर इस मामले में सुनवाई शुरू कर दी। इस मामले में पांच सालों से सुनवाई चल रही थी और छह माह से बहस। उसके बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया।

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