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पहली बार आहत हुआ बंगाली प्राइड, इस पार्टी को होगा बड़ा…

पश्चिम बंगाल ने आजादी के बाद से अब तक राजनीति के कई रंग देखे हैं। राजनीतिक विचारधाराओं का खूनी टकराव देखा है, कभी भ्रष्टाचार और कभी औद्योगिक घरानों के खिलाफ आंदोलन देखे हैं। लेकिन इन तमाम उतार-चढ़ाव के बीच कभी भी ‘बंगाली प्राइड’ पर आंच नहीं आई। बंगाली प्राइड यानी जाति-धर्म और राज्य की सीमाओं से परे प्रबुद्धता और सांस्कृतिक समृद्धता के सूत्र से जुड़ी आबादी। शहरों ही नहीं कस्बों और गांवों तक पसरी इस भावना में न बाहरी-भीतरी का भेद रहा है और न हिंदू-मुस्लिम का फर्क, लेकिन इस चुनाव में ये बंगाली प्राइड तार-तार हुआ है।

इंटेलेक्चुअल्स का मानना है कि भाजपा और तृणमूल के मुकाबले में नुकसान बंगाल की संस्कृति को हुआ है। ममता बनर्जी ने भाजपा को निशाना बनाने के लिए बाहरी का मुद्दा उठा दिया। हालांकि उन्होंने बाद में सफाई भी दी कि बाहरी का मतलब सिर्फ भाजपा की चुनावी भीड़ है, लेकिन इस मुद्दे ने राज्य में सालों से रह रहे, बंगाली बोलने वाले और यहां की संस्कृति में रमे गैर-बंगालियों और बंगालियों के बीच एक खामोशी की खाई जरूर खींच दी है। इसी तरह भाजपा के बार-बार मुस्लिम तुष्टिकरण का मुद्दा उठाने से राज्य की मध्यमवर्गीय और निम्न मध्यमवर्गीय बंगाली आबादी के मन में ये सवाल जरूर उठने लगे हैं कि कहीं उनके रोजगार पर संकट का कारण तृणमूल का अल्पसंख्यक प्रेम तो नहीं है।

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भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व अधिकारी सिद्धार्थ गुहा कहते हैं कि इस चुनाव में पहली बार लोगों के बीच हिंदू-मुस्लिम को अलग-अलग देखने की भावना आई है। जो बातें भीतर थीं, वह खुलकर सामने आ गई हैं। हालांकि इस चुनाव में एक सार्थक बदलाव भी हुआ है। लेफ्ट फ्रंट के समय से ही चुनाव के दिन एलिट क्लास खुद को वोटिंग से दूरी रखता था। तृणमूल के दौर में भी यही क्रम जारी रहा। यह वर्ग मतदान के दिन छुट्‌टी मानकर चलता था, लेकिन इस बार केंद्रीय बलों की सक्रियता के चलते यह वर्ग भी वोटिंग के लिए निकला। यहां राजनीतिक दलों में यह भावना हावी रही है कि यह एलिट क्लास हमेशा एंटी इन्कम्बेंसी फैक्टर का मुख्य कारक रहा है।

हिंदू-मुस्लिम बंटवारे की सिद्धार्थ गुहा की बात से विधाननगर के रिटायर्ड इंजीनियर पार्थ मजूमदार भी इत्तेफाक रखते हैं, लेकिन उनका कहना है कि यह भावना सरकारों की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों से उपजी है, और ऐसा लेफ्ट पार्टियों के शासन के दौर से ही चल रहा है। पहले लोग इस पर गौर नहीं करते थे, लेकिन ममता बनर्जी के कार्यकाल में जिस तरह के काम हुए हैं उससे लोगों के मन में ज्यादा कड़वाहट आई है। सांप्रदायिक सौहार्द बंगाल के सामाजिक ताने-बाने में रचा-बसा है। हालांकि इस बार इसे नुकसान तो पहुंचा है। इससे चुनाव नतीजे कितने प्रभावित होंगे यह कहना मुश्किल है, लेकिन बिखराव तो आया है।

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सिलीगुड़ी के बापी दास कहते हैं कि मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा से एक वर्ग नाराज है। ऐसी मान्यता हो गई है कि कहीं हिंदू और मुस्लिम के बीच विवाद हो तो सत्तासीन दल की शह पर प्रशासन मुस्लिमों का पक्ष लेगा। पहले ऐसा नहीं था। हाल के दिनों में बांग्लादेशी मुस्लिमों की असामाजिक गतिविधियों में लिप्तता के चलते लोगों में एक डर भी बैठ गया है। कोलकाता में ड्राइवर का काम कर रहे कैलाश यादव कहते हैं कि बांग्लादेशी मुसलमानों की बढ़ती संख्या और उसके प्रभाव के कारण आज हम जैसे कई लोगों की रोजी-रोटी भी प्रभावित होने लगी है। उनकी तादाद इतनी हो गई है कि उन्हें काम ज्यादा सहूलियत से मिल जाता है।

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक गंगा प्रसाद का कहना है कि यह पहली बार है कि चुनाव में पार्टियां खुद को ज्यादा हिंदू या ज्यादा बंगाली साबित करने की कोशिश में जुटी हैं। सिलीगुड़ी के पत्रकार सागर बागची कहते हैं कि ममता बनर्जी ने बंगालीयत से जुड़ने के लिए जय बांग्ला का नारा तो दिया है, लेकिन इस बार लोग उनके नारे से खुद को जोड़ नहीं पा रहे हैं।

हालांकि एक वर्ग वह भी है जो ध्रुवीकरण के इन प्रयासों से आहत है। बारारासात विधानसभा क्षेत्र के मायना हाट में मोबाइल दुकान चला रहे समद रहमान कहते हैं कि भाजपा हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा खड़ा कर वोट बटोरने में लगी है। इस बार उसकी हवा भी लग रही है, लेकिन ममता बनर्जी कमजोर नहीं हो पाएंगी क्योंकि वह सबको मिलाकर चलती हैं।

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